Thursday, December 1, 2022
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ब्रह्मास्त्र फ़िल्म  रिव्यू

ब्रह्मास्त्र फ़िल्म  रिव्यू : स्वराज श्रीवास्तव

आम तौर पर एक फ़िल्म को देखने वाले दो तरह के लोग होते हैं- पहला रिव्यूवर और दूसरा व्यूवर. ऐसा इसलिए क्योंकि रिव्यूवर फ़िल्म को कई नज़रिए से परखता है. उसके अच्छे और बुरे हिस्सों की पहचान करता है और फिर तय करता है कि आम दर्शकों के लिए फ़िल्म पैमाने पर कहाँ उतरती है. लेकिन व्यूवर सिर्फ़ अपने नज़रिए से फ़िल्म देखता है. उसे इस बात से फ़र्क़ नहीं पड़ता कि फ़िल्म में कितनी अच्छाई है और कितनी बुराई. व्यूवर किसी फ़िल्म के नायक या नायिका का समर्थक भी हो सकता है और किसी विचारधारा को मानने वाले धड़े का समर्थक अथवा विरोधी भी.  ब्रह्मास्त्र को लेकर जो तमाम रिव्यू लिखे गये हैं उनमें कहीं न कहीं, कुछ न कुछ रह गया है. किसी के लिए फ़िल्म पूरी तरह बकवास है तो किसी के लिए बेहतरीन. फ़िल्म को लेकर दोनों छोर से जो प्रयास किए जा रहे हैं वो भी मैं साफ़ तौर पर देख सकता हूँ. इस ‘प्रयास’ की चर्चा बाद में करूँगा, पहले फ़िल्म की बात करते हैं.

सबसे पहले ये स्पष्ट कर दूँ कि फ़िल्म को लेकर मैं किसी भी विचारधारा से प्रभावित नहीं हूँ और ना ही किसी व्यक्ति विशेष या विचारधारा में इतना दम है कि मुझे प्रभावित कर सके. इसलिए इससे ज़्यादा साफ़गोई और ईमानदारी से लिखे रिव्यू को आप कहीं और नहीं पाएँगे.

ये एक सच्चाई है कि फ़िल्म में कुछ सीन ज़बरदस्ती खींचे गए हैं और इससे बचा भी जा सकता था. कई डायलॉग बेफालतू के हैं जिन्हें और बेहतर किया जा सकता था. कई बार सीन एक-दूसरे से कनेक्शन नहीं जोड़ पाते. फ़िल्म देखते हुए आप कई बार बोर फ़ील करते हैं. देवा-देवा गाने को छोड़कर बाक़ी के गाने सीन से मैच नहीं होते. ऐसा लगता है कि बस गाना जोड़ने के लिए ज़बरदस्ती का एक सीन बना दिया गया है. पहली मुलाक़ात में ही ईशा (आलिया) शिवा (रणबीर) से जितना फ़्रेंडली हो जाती है इसका वास्तविकता से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है. फ़िल्म में शिवा को अनाथ दिखाया गया जो अनाथालय के बच्चों को बहुत प्यार भी करता है. ये वही पुराना घिसा-पिटा कॉन्सेप्ट है जिसे पुरानी फ़िल्मों में नायिका को इंप्रेस करने के लिए प्रयोग किया जाता था. हाँ लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि फ़िल्म का वीएफ़एक्स तगड़ा है. 410 करोड़ का बजट वीएफ़एक्स देखने के बाद जस्टिफाइड लगता है. ये समझ आ जाता है कि इस फ़िल्म को बनाने में इतना समय क्यों लगा है. शाहरुख़, नागार्जुन, आलिया, रणबीर, अमिताभ बच्चन और मौनी रॉय ने अपना किरदार बखूबी निभाया है. सबसे ख़ास बात ये है कि फ़िल्म में कुछ नया दिखाने की कोशिश है. बीते कुछ समय से बॉलीवुड जिस कट-कॉपी-पेस्ट के दौर से गुज़र रहा है, ऐसे में अयान मुखर्जी के इस प्रयास की सराहना की जानी चाहिए. हमारी सबसे बड़ी गलती यह है कि जब बॉलीवुड कॉपी-पेस्ट पर आधारित फ़िल्में बनाता है तो हम ही उसकी बुराई करते हैं और जब कोई कुछ नया करने की कोशिश करता है तो उसे तमाम बेफ़िज़ूल के पैमानों में तौलकर उसका आत्मविश्वास गिरा देते हैं. यदि ऐसी कोशिशों को हम बतौर दर्शक तवज़्ज़ो नहीं देंगे तो जो बचे-खुचे लोग कॉपी-पेस्ट से हटकर कुछ और बना रहे हैं वो भी कोशिश करना बंद कर देंगे.

वैसे इस बात का रिव्यू से कोई संबंध नहीं है लेकिन बताना ज़रूरी है कि एक बड़े स्टार की आने वाली फ़िल्म जो साउथ की एक फ़िल्म का रीमेक है, उसकी रिलीज़ से पहले ही ओरिज़िनल फ़िल्म को ओटीटी से हटवा, मेरा मतलब हटा दिया गया है.

ख़ैर, ब्रह्मास्त्र को लेकर दोनों छोर से प्रयास किए जा रहे हैं. बायकॉट वाला धड़ा फ़िल्म का निगेटिव प्रचार कर रहा है तो वहीं मेकर्स और प्रमोटर्स फ़िल्म की पॉज़िटिव इमेज बनाने के लिए सोशल मीडिया इंफ़्लूएंसर का सहारा ले रहे हैं. आपने सोशल मीडिया पर कई इंफ़्लूएंसर्स की विडीयो या स्टोरी देखी होगी जिसमें वो कह रहे हैं कि ‘फ़िल्म बहुत लाजवाब है, मैंने देख ली है, आप भी ज़रूर जाइए.’ यात्रीगण कृपया ध्यान दें कि ये सारे विडीयो पेड हैं. हर विडियो और स्टोरी में आपको एक ही तरह का हैशटैग देखने को मिलेगा.

इन सारी बातों का सीधी-सपाट भाषा में सार इतना है कि ब्रह्मास्त्र काल्पनिकता पर आधारित थिएटर में जाकर एक बार ज़रूर देखे जाने वाली फ़िल्म है. हिंदू धर्म शास्त्रों में वर्णित अस्त्रों का नाम फ़िल्म में केवल ध्यानाकर्षण के लिए किया गया है. अगर आप फ़िल्म में धर्म और संस्कृति खोजने जाएँगे तो उससे बेहतर है कि घर बैठकर किताबें पढ़िए, वही उचित होगा. फ़िल्म का फ़र्स्ट हाफ़ आपको थोड़ा बोर ज़रूर करेगा लेकिन सेकंड हाफ़ आपको उतना ही रोमांचित भी करेगा. हाँ एक बात ज़रूर है कि फ़िल्म से लव स्टोरी के बेफ़िज़ूल सीन काटकर लम्बाई कम कर दी जाती तो अनुभव और बेहतर होता.

मेरी तरफ़ से फ़िल्म को 3.5 स्टार.

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