Tuesday, September 27, 2022
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अफगानिस्तान और भारत

15 अगस्त 2021* को *75 वी* वर्षगाँठ के तौर पर, जब पूरा भारतवर्ष अंग्रेज़ों के चंगुल से निकलने पर खुशियों के दीप जला रहा था। आजादी के तराने, देशभक्ति के गीत गुनगुना रहा था। भारत के लाखों वीर सपूतों की कुर्बानियों को याद कर उन्हें नम आँखों से सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर कर रहा था। अफसोस उसी दिन भारत विश्व पटल पर अपनी शर्मनाक कुटनीतिक हार का शोक मना रहा था। जब प्रधानमंत्री जी राजधरोहर के मंच से हर वर्ष की तरह लंबी लंबी लांघ रहे थे। भारत की भोली जनता को सुनहरे ख़्वाब दिखा रहे थे। ठीक उसी समय तालिबान अफगानिस्तान के सभी बड़े बड़े शहरों पर अपने पंजे गाड़ते हुए काबुल के दरवाजे पर दस्तक दे रहा था। इस बार अधिकतर भारतवासी असमंजस का शिकार थे, उनकी समझ में नहीं आ रहा था के वो आज इस दिन को उल्लास के रूप में मनाएं, या अफ़ग़ानिस्तान में अपने खरबों रुपयों के डूबने पर मातम करें। हर कोई इस दिन को अपने अपने अंदाज़ में मना रहा था। किसी के चेहरे पर मुस्कान थी, तो कोई उदासी की हालत में बैठा भारत के भविष्य को लेकर चिंतित था।

एक भारतीय होने के नाते मैं भी इस तथाकथित आज़ादी पर जश्न मनाने से अधिक अफगानिस्तान में भारत की कुटनीतिक हार का शोक मना रहा था। क्योंकि जिस चालाक लोमड़ी/स्वार्थी मित्र *अमेरिका* के कहने पर भारत अफगानिस्तान में खूब दिलचस्पी ले रहा था। खरबों रुपयों को बिना सोचे समझे उसके कहने पर बहा रहा था। जिस मक्कार की खातिर अपने पड़ोसी देशों से दुश्मनी मोल ले रहा था। वही धोखेबाज अपने सहयोगी मित्र भारत से बिना विचार विमर्श किए, आज अफगानिस्तान से दुम दबा कर भाग रहा था। उस गिरगिट ने इस बार भी वही किया जो वह हमेशा से करते आया है। जब उसने अपनी नैया डूबती देखी तो यारों को बे यारो मददगार छोड़ कर फरार हो गया। स्थिति यह कि आज भारत खुद को अकेला खडा महसूस कर रहा है।

अगर हम मध्य एशिया में भारत की नीतियों पर दृष्टि दौड़ाएं तो ऐसा प्रतीत होता है कि सभी नीतियां फरेबी अमेरिका के दबाव या फिर उसके इशारे पर बनायी गयी हैं। उसके इशारों पर चलने के कारण ही आज भारत के सभी पड़ोसी देशों से से सम्बंध बड़े खटास भरे हैं।
नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, पाकिस्तान, चाइना यहां तक की उसी के कारण रूस से भी संबंध पुराने जैसे ना रहे। खराब विदेश नीतियों के कारण हिन्दुस्तान आज बुरे दौर से गुजर रहा है. सबसे बड़े शत्रु चीन का पड़ोसी देशों पर प्रभुत्व दिन दिन बढ़ता जा रहा है जो किसी खतरे के सायरन से कम नहीं है। एक आम नागरिक के रूप में यह सोचने का विषय है कि भारत की इस दुर्दशा का आख़िर जिम्मेदार कौन है??? *कॉंग्रेस या मौजूदा सरकार*. खैर मौजूदा सरकार पर लबकुशाई करना तो बेकार है, *क्यूंकि हालिया प्रधानमंत्री तो केवल श्रेय लेने के लिए सिंहासन पर विराजमान हैं।*

आज तालिबान, पाकिस्तान, चीन, रूस आदि एक प्लेट फार्म पर नजर आ रहे हैं, तो वहीं अमेरिका भी दबी आवाज में इनकी सफ में खड़ा होता दिख रहा है। मेरे विचार के अनुसार ऐसे में भारत को भी चाहिए कि वह दूसरे पड़ोसी देशों की तरह आगे बढ़ कर तालिबान के साथ मज़बूत और बेहतर संबंध बनाने का प्रयास करे, ताकि पड़ोसी दुश्मन मुल्क उस सरज़मीन का भारत के विरुद्ध गलत प्रयोग न कर सके। कश्मीर आदि में अमन व शांति बनी रह सके और साथ साथ ही अफगानिस्तान में खरबों के निवेश को भी बचाया जा सके। वैसे भी तालिबान हमारा कोई जाती दुश्मन नहीं है। जिस तरह दूसरे देश अपने हितों को सामने रखकर तालिबान से संबंध मजबूत करने में जुटे हैं ठीक ऐसे ही भारत को भी, ‘अफगानिस्तान में क्या हो रहा है इसकी चिंता किए बगैर’ अपने हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। दूसरों के घरों में क्या हो रहा है इस पर समय बर्बाद किए बिना अपने घर की चिंता करनी चाहिए। यहां की उन्नती, शांति,भाइचारे को कायम रखने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। यहाँ डगमगाती हुई ‘अनेकता में एकता’ की खूबसूरती को कायम रखने में अपनी तवानाई खर्च करनी चाहिए। *ताकि वास्तव में भारत एक ख़ुशहाल देश और विश्व गुरु बन सके।*

 

                     –  दानिश मालिक 

 

*यह लेखक के निजी विचार है, the जनता लेखक के विचारों की पुष्टि नहीं करता*

 

 

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